Friday, April 23, 2010

आज की पर्यावरणीय वास्तविकता

आज की पर्यावरणीय वास्तविकता

डा. निलेश कमलकिशोर हेडा, संवर्धन संस्था, कारंजा लाड

आज की पर्यावरणीय वास्तविकता भीषण है. महत्वपूर्ण बात ये है कि इस भीषणता की कल्पना तथा पर्यावरणीय विनाश से उप्तन्न खतरों को भापने की समझ हमारे नेतागण, अध्ययनकर्ता तथा आम आदमी के बीच दिखाई नही देती.

इस लेख की शुरुआत करने से पहले पर्यावरण के संबंध में कुछ मूलभूत बातों को हमे समझना चाहिये. एक दूरें से जुड़े हजारों घटकों की सुचारु व्यवस्था का नाम है पर्यावरण. जैविक तथा अजैविक घटक एकत्र होकर प्रकृति का सुंदर जाल बना है. इस तरह के हजारों घटकों के सहसंबंध हजारो साल की संभाव्यता (Probability) तथा जिन बातों की आवश्यकता नही ऐसी बातों को अलविदा कह कर तैयार हुयी है.

हम अगर जीव की उत्पत्ति तथा विकास का बारीकी से जायजा लेते है तो दो बातें स्पष्ट हो जाती है, जीवन की शुरुवात से अब तक जीवन ज्यादा से ज्यादा क्लिष्ट (Complex) होता गया है तथा जीवन में विविधता (Diversity) धीरे धीरे बढ़ती गई है. पृथ्वी पर जीवन की शुरुत ३.५ अरब साल पहले हुयी. शुरुती जीव बिल्कुल सरल सी रचना के थे लेकिन बाद मे जैसे जैसे समय बीतता गया जीवन क्लिष्ट होता गया. एकपेशीय अमीबा जैसे सरल से दिखने वाले शुरुआती जीवों ने विकास की प्रक्रिया मे अनेकानेक रुप धरे. शुरुती जीव एक जैसे दिखने वाले थे लेकिन आज हमे विभिन्न आकार, प्रकार के जीव देखने को मिलते है, जिसे हम जैवविविधता (Biodiversity) के नाम से जानते है. ऐसा किस कारण हुआ होगा? इतने विचित्र जीव निर्माण करणे की प्रकृति को क्या आवश्यकता थी? इसका तर्क संगत उत्तर पहली बार एक व्यक्ति ने दिया; चार्लस डार्विजिसका नाम था. डार्विन ने कहां की, प्राकृतिक चुनाव (Natural Selection) एक ऐसी प्रक्रिया है जीसके द्वारा जीव विकसीत होते है. प्रकृति चुनाव करती है. जो ज्यादा शाश्वत है उसको चुनती है. जीने के लिये लगने वाले संसाधन सिमीत होते है लेकिन जीव काफी ज्यादा मात्रा मे होते है. इस वजह से संसाधनों के लिये दो जीवों मे प्रतिस्पर्धा (Competition) उत्पन्न होती है. इस तरह की प्रतिस्पर्धा मे दो विकल्प हर एक जीव के पास होते है, या तो खत्म हो जाओ या अपने मार्ग अलग कर लो. जीवन कभी भी नष्ट होना नही चाहता. कैसे भी करो लेकिन जीवंत रहो ये प्रकृति का धर्म है अत: हर जीव अन्य जीवों से अपने मार्ग अलग करने की जद्दोजह में लगा होता है. अपने मार्ग अन्य जीवों से अलग करने का अर्थ होता है विभीन्न प्रकार के संसाधनों का उपयोग करना. उदाहरणार्थ मछलियां पाणी मे रहेगी, शेर मांस खायेंगे आदि इस तरह के विभाजन से प्रतिस्पर्धा मे कमी आती है तथा विभीन्न प्रकारके जीव निर्मित होते है (अगर सारे जीव घास खाने लगे तो सारा जीवन ही डांवाडोल हो जायेगा). संक्षेप मे, पिछले ३.५ अरब सालों मे विभिन्न प्रकार के जीवों की एक महान श्रृंखला का निर्माण हुआ. अध्ययनकर्ता मानते है की आज दुनिया मे लगभग ८० लाख से १२० लाख के आसपास विभिन्न प्रकार की जैव प्रजातियां (Species) होनी चाहिये. इस तरह करोडों सालों मे निर्मित हुई जीव सृष्टी आज केवल एक जीव के कारण; बुद्धीमान मानव जिसका नाम है; नष्ट होने की कगार पर है और यहीं हमारी आज की पहली पर्यावरणीय कटु वास्तविकता है. आज दुनिया भर मे हर साल १४०,००० प्रजाती हर साल खत्म हो रही है. उदाहर के लिये चीता भारतीय मानसपटल से पूरी तरह से लुप्त हो चुका है, वही बात किसी समय बहुतायत मे पाये जाने वाले गिदड (Vulture) के बारे मे भी है, बाघ, शेर, गेंडे चिंताजनक मात्रा मे घट गये है आदि. स्तनपाई जीव, सरीसृप, पक्षी तथा मछलियों की कई प्रजातियां नष्ट हो चुकी है. वानस्पतीक जगत भी खतरे मे है. एक अमुक पक्षी अगर नष्ट हो जाता है तो क्या बिगड़ेगा ऐसी सोच भी कई लोग रखते है, लेकिन हमे समझना चाहिये की प्रकृति का संतुलन ऐसी ही अनेक प्रजातियों से बनता है. जब कोई प्रजाती खत्म होती है तो उसके दुरागामी परिणाम सारे पर्यावरण को बुरी तरह से प्रभावित करते है.

हमारे समय की दूसरी पर्यावरणीय वास्तविकता है जीवों के आवास का नष्ट होना. हर एक जीव का एक रहने का निवास स्थान होता है जिसे पारिस्थितिकी मे अधिवास या आवास (Habitat) कहा जाता है. अगर ऐसे आवास स्थान नष्ट होते है तो जीव भी नही बचेंगे. आदमी द्वारा कृषि के शोध से अब तक ( पिछले दस हजार सालो मे) ५० प्रतित प्राकृतिक भूभागों में परिवर्तन किये गये है. कृषि के लिये जंगलों का सफाया करना, नदीयां, तालाब, सागरों को प्रदुष से सराबोर करना, विभिन्न प्रकार के तथाकथी विकास के लिये, निज पदार्थों के दोहन के लिये हजारो हेक्टेयर प्राकृतिक भूदृष्यों मेंमूल परिवर्तन कर दिये गये है. नजदीकी उदाहरण के तौर पर देखें तो विदर्भ मे हजारों सालों से छोटे छोटे तालाबों की सुंदर सी सामाजिक तथा प्राकृतिक रचना थी. ये तालाब हर एक गांव तथा शहर के लिये अमृत के घट थे. आज अतिक्रम से, प्रदूषन से, तालाब मे निरंतर मिट्टी एकत्रित होने से, जलपर्णी तथा बेशरम जैसे पौधों की बहुतायत से सारे तालाब नष्ट होने की कगार पर है.

हमारे समय की तीसरी पर्यावरणीय वास्तविकता है विश्व का लगातार बढता तापमान (Global Warming) तथा उस वजह से होने वाला जलवायु परिवर्तन (Climatic Changes). जलवायु परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारण है पृथ्वी के औसतन तापमान मे वृद्धि होना. बीसवीं सदी के मध्य से ही पृथ्वी के औसतन तापमान में ०.७५ डिग्री सेंटीग्रेड से वृद्धि हुई है. सूर्य से हमारी पृथ्वी को उर्जा प्राप्त होती है. सूर्य से पृथ्वी की ओर आने वाली कुछ किरणे पृथ्वी आत्मसात करती है तथा कुछ किरणे पृथ्वी तथा सागर के पृष्ठभाग से टकराकर वापस अंतरिक्ष मे चली जाती है जिससे पृथ्वी ज्यादा गर्म नही हो पाती. पिछले ३०० सालों मे हमारी र्जा की जरुरतें हजा गुना बढ़ गई है. ऊर्जा निर्माण की प्रक्रिया मे कार्बन डाय आक्साइड वातावरण मे निष्कासित होता है. साथ ही मिथेन भी अनेक प्रक्रियाओं द्वारा निष्कासित होता है. इन गैसों को ’ग्रीन हाऊस गैस’ (Green House Gas) कहते है. पानी की भाप तथा ओजोन भी इसमें समाहित होते है. ये ग्रीन हाउस गैसें पृथ्वी से बाहर जाती सूर्य की किरणों को सोख लेते है तथा उष्ण लहरों के रुप में पुन: पृथ्वी को वापस कर देती है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ जाता है. इस बढ़ते तपमान की वजह से ध्रुवों में संचीत बर्फ पिघल रही है, सागर का स्तर बढता जा रहा है तथा मांसुन चक्र मे परिवर्तन आ रहा है. इससे कहीं सूखा तो कहीं बहुत ज्यादा बारीश ऐसी परिस्थिति निर्मित हो रही है. पुणे मे स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट आफ ट्रापीकल मेटेरोलाजी के अध्ययन कर्ताओं ने सायंस नाम के जर्नल में २००६ मे प्रकाशित शोध निबंध के अनुसार भारत के शुष्क प्रदेशों मेंतिवृष्टी का प्रमाण गत ५० सालों मे १० प्रतीषत से बढ़ा है. बंगलोर स्थित द सेंटर फार मॅथेमेटीकल माडलिंग तथा कंप्यूटर सिमुलेशन नामक संस्था ने किये शोध से स्पष्ट होता है कि भारत के शुष्क विभाग जैसे उत्तर मध्य प्रदेश, क्षिण उड़िसा में अतीवृष्टी की मात्रा बढ़ गई है. उसी समय भारत के कई भागों में सूखे की मात्रा भी बढ़ती जा रही है. २६ जुलाई २००५ को मुंबई में २४ घंटो मे आयी ९४४ मि.मि. रिकार्डतोड बारीश इस परिवर्तन की शुरुवात थी (श्चिम विदर्भ मे पूरे साल मे इतनी वर्षा नही होती ये उल्लेखनीय है). ये परिवर्तन पृथ्वी के तापमान में हो रही वृद्धी की वजह से हो रहे है.ढ़ते तापमान की वजह से सागर की सतह ज्यादा गर्म होती है परिणामत: ज्यादा बाष्प निर्मित होती है. इस तरह तैयार हुयी बाष्प किसी एक जगह पर अचानक ही बरस पड़ती है और कही सुखा तो कही अतीवृष्टी की परिस्थिती निर्मित होती है.

हमारी चौथी तथा अंतिम पर्यावरणीय वास्तविकता है परदेसी प्रजातीयों की मात्रा बढ़ना. बेशरम, गाजर घास, जैसी खरपतवार, तिलापिया, आफ्रिकन मागुर जैसी मछलियां आदि की तादाद भारतीय वातावरण मे बढ़ गई है. ये प्रजातियां मूल रुप से भारतीय नहीं है. ये प्रजातिया यंहा की मूल प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा करती है तथा यहां की प्रजातियों को नष्ट कर देती है... २००३ में विदर्भ की केवल एक नदी में पहली बार मैने खुद तिलापिया नाम की दक्षिणफ्रीका की नदीयों मे पायी जानेवाली मछली को प्रथमत: देखा था. आज विदर्भ की हर नदी तथा तालाब में उसकी मात्रा बढती जा रही है और मछलियों की स्थानीय प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर पहुचुकी है. इसका कारण ये है की तिलापिया किसी भी परिस्थिती में अपने को ढाल लेती है, उसपर रोग नही आते तथा अन्य मछलियों के अंडे को वो खा लेती है.

अब हम इन सारे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने की दिशा मे क्या कर सकते है इसका विचार करेंगे. इस संदर्भ मे महात्मा गांधी का एक वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है, गांधीजी कहा करते थे कि, यह पृथ्वी हम सब की जरुरतों को पूरा करने का सामर्थ्य रखती है लेकिन हमारे लोभ को पूरा करने की क्षमता इसमे नही है.’ पिछले ३०० सालों मे बढ़ी आबादी की जरुरतों को पूरा करने के लिये हमने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है, जिससे संसाधनों मे कमी तो आयी है साथ ही प्रदूषण के स्वरुप में वातावरण में जहर भी घोला गया है. अत: हमारी जरुरतों को सीमित करना, उर्जा, जल जैसे संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी से करना अत्यावश्यक है.

प्राचीन काल के भारत में प्रकृति के साथ समायोजन कर जीने का ढंग था. दियों को माता, पहाड़ों तथा जंगलो को पिता का दर्जा दिया जाता था. भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न जन-जातीयों द्वारा अनेकानेक प्रजातीयों को श्रद्धा के अंतर्गत संरक्षित किया जाता था. वहीं बात प्राकृतिक आवासों के संदर्भ में भी सच है. देवराई (Sacred Grove. भगवान के नाम रखा गया जंगल), पवित्र झरने, कुंडो (Sacred Ponds) के रुप मे अनेकानेक प्राकृतिक आवासों को जन सामान्य ने धार्मिक प्रथाओं के तहत संरक्षित किया था. ढ़ते बाजारवाद तथा पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते चलन ने आम भारतीयों के मन मे समाहित प्रकृति प्रेम को धीरेधीरे नष्ट कर दिया है. हमारे वर्तमान, तथाकथीत विकास की संकल्पना की भी समिक्षा करने की आवश्यकता है. हमारा विकास का माडल क्या कहता है? ज्यादा से ज्यादा कारें, ज्यादा से ज्यादा कारखाने, रासायनिक खेती से बढता उत्पाद ही विकास है.से विकास का अमरीकी उपभोक्तावाद पर आधारित माडल ही प्रकृति को जबरदस्त नुकसान पहुंचा रहा है. ऐसे मे नई पीढ़ी के मन मे प्रकृति के संबंध मे प्रेम को बढावा देना तथा वास्तविक विकास क्या है इस बारे मे सकारात्मक नजरीया बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है. मेरे देखे वास्तविक विकास, शाश्वत विकास (Sustainable Development) वो होता है जिमें प्राकृतीक संसाधनों की शाश्वतता अबाधीत रहती है और लंबे समय तक सभी को समान रुप मे संसाधन मुहैया होते रहते है.

प्रकृति के संबंध मे अध्ययन के संबंध में भी हम काफी पिछड़े है. जानकारी के अभाव मे प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन सरकारी तबकों मे किया जा रहा है. दिल्ली के समीप स्थित सरिस्का बाघ परियोजना का हम उदाहरण लें तो, सालों साल वन विभाग बाघों के झूठे आकडें देता रहा था लेकिन असल मे सरिस्का के सारे बाघ शिकारियों की भेंट चढ चुके थे. अत: प्राकृतिक घटकों की जानकारी को बढाना अत्यावश्यक है. ऐसी जानकारी प्रकृति के सानिध्य में रह रहे आदिवासी, वैध्य, मछुआरे, पशुपालकों के पास बहुतायत में होती है. उस ज्ञान को सहेजकर उसके उपयोग को बढावा देना अत्यावश्यक है.

ऐसे दौर में प्रकृति के बारे में, उसमें हो रहे नकारात्मक परिवर्तनों के बारे में नई पिढ़ी में जागृती उत्पन्न करना, रोजगार गारंटी योजना (NREGA) जैसे माध्यम से नष्ट हुये संसाधनों को पुनरुज्जीवित करना, वृक्षारोपण, रुफ टाप हारवेस्टिं(Roof Top Harvesting) जैसे आसान तरीके से विनाश की ओर अग्रसर प्रकृति को बचाना संभव है.

केवल सरकारी विभाग जैसे वन विभाग, सिंचाई विभाग, मछलिपालन विभाग ही प्रकृति का संवर्धन करेंगे सा मानना गलत है. जब तक प्रकृति को बचाने का आंदोलन आम आदमी का जन-आंदोलन नही बनता तब तक प्रकृति को बचाना असंभव है.

@ डा. निलेश हेडा,

संवर्धन, एपीएमसी के पास, वाशिम रोड, कारंजा (लाड), जिला वाशिम, ४४४१०५. महाराष्ट्र

( ९७६५२७०६६६.

(लेखक पर्यावरणविद् है तथा लंन स्थित रुफोर्ड मारिस फाउंडेशन से सहायता प्राप्त नदी अध्ययन तथा संवर्धन परियोजना के प्रबंधक है.)

अरुणावतीचे अश्रू पुसण्याची गरज आहे

अरुणावतीचे अश्रू पुसण्याची गरज आहे

डॉ. नीलेश हेडा

संवर्धन

कारंजा (लाड)

( ९७६५२७०६६६

नदी अभ्यास आणि नदीच्या व्यवस्थापनशास्त्राचा पहिला धडा मी मानोरा शहरातुन वाहणा-या अरुणावती नदीच्या काठावर सुमारे २० वर्षांआधी गिरवला. ही नदी तेव्हा ख-या अर्थाने ’नदी’ होती, सतत प्रवाही. पावसाळ्यात दुथडी भरुन वाहणारी ही नदी पुर आला की रौद्र रुप धारण करायची. मानो-याच्या पोलिस स्टेशन जवळची ‘घाटी’ फुटली की बाजारातली सारी दुकानं उठायची. अनेक दुकानदार नदीला नारळ अर्पन करुन पुर कमी होण्याची प्रार्थना करायचे. नदीच्या काठावर असलेले मारुतीचे मंदीर म्हणजे आमचा ’परमनंट’ आसरा. नदीच्या एका काठावर विस्तीर्ण असे भराटीचे रान ज्याला आम्ही ’भराट बन’ म्हणायचो आणि भराटबनच्या नंतर दिग्रस रोड वर आमची शाळा, रविंद्रनाथ टागोर विद्यालय. मानोरा हे गाव त्या काळी नैसर्गिक संसाधनाने परिपूर्ण होते. एकीकडे उंच हिरवीकंच्च टेकडी त्याच्या खाली सतत वाहणारी अरुणावती आणि नदीच्या काठावर वसलेले मानोरा हे गाव अशी सुंदर नैसर्गिक रचना असलेले हे एक टुमदार गाव. वसंत नगर, जुणे मानोरा शहर आणि धामणी ह्या तीन पाड्यात विभागलेले हे शहर प्रत्येक कोप-यावर नदीशी सतत संपर्कात असल्यासारखे आहे.

सुमारे पंचेविस वर्षानंतर अरुणावती बघणे हा एक मनस्ताप देणारा अनुभव आहे. ज्या डोहाचे पाणी कधीच तुटले नाही ते सारे डोह आता हळुहळू गाळाणे भरत आहेत. शहर वाढत गेले तशी पाण्याची गरज वाढत गेली. जशी पाण्याची गरज वाढत गेली तसे प्रदुषन वाढत गेले. अतीक्रमणाने नदीचा सुद्धा घास घ्यायला सुरुवात केली. जुण्या शहराजवळ एक मोठा नाला नदीला मिळतो. तो नाला एका फार मोठ्या भूभागाचे पाणी अरुणावतीला देतो. आता तो नाला संपला आहे. वाढणा-या मानोरा शहराला नैसर्गिक संसाधने पुरवता पुरवता आसपासचे हिरवे डोंगर उघडे बोडखे व्हायला लागले. झाडोरा संपल्याने मातीची धुप व्हायला लागली. शहरात मोठ्या प्रमाणावर खोदल्या जाणा-या बोअरवेलने नदीचे पात्र कोरडे व्हायला लागले. जुण्या मानोरा शहरालगत गिट्टी खदान आहे, तीचे क्षेत्र वाढत गेले त्याच वेळी वाढणा-या शहरासाठीच्या घर बांधणीसाठी रेतीचा अविरत उपसा वाढला आणि नदीची नैसर्गिक संरचना पुर्णत: बदलायला लागली. अरुणावतीच्या काठावर भोई लोकांची वस्ती आहे. मानो-याच्या भोई लोकांसाठी अरुणावती म्हणजे हक्काच्या रोजगाराचा राजमार्ग. लहानपणी अनेक तास भोयांची मासेमारी निरखत बसायचो. एकदा मानो-याच्या बाजारात एका भोयाने एक प्रचंड आकाराचा कासव पकडुन आणला होता. नक्कीच तो ५० किलो वजनाचा तरी असावा. इतक्या मोठ्या आकाराचा कासव नंतर मी माझ्या प्राणीशास्त्राच्या संपूर्ण कारकिर्दीत बघीतला नाही, पण नदीतील जैवविविधतेचे अधिवास नष्ट झाले, कासव ही गेले आणि माश्यांच्या अनेक जाती सुद्धा संपूष्टात आल्या. मध्यंतरी अमेरीकेतील इंडीयाना विद्यापीठातील माझ्या एका मत्स्य अभ्यासक मैत्रीनीसोबत मानोरातील मुस्लीम कब्रस्तान लगतच्या डोहात मासेमारी करायला गेलो अनेक तास मासेमारी करुनही हाती काही विशेष लागलेच नाही. कुठे गेले सर्व मासे? निसर्गात बदल होतच असतात, पण इतक्या वेगाने बदल होऊ शकतात ह्याचा मी कधी विचारच केला नाही.

आज वर्तमान पत्रातुन मानोरा शहरात पाण्याची भिषण टंचाई आहे अशा बातम्या येतात आणि मी आश्चर्यचकित होतो. ज्या शहराजवळ सतत प्रवाही अरुणावती आहे त्या शहराचे पाण्यासाठी असे हाल ! जी परिस्थिती मानोरा लगतच्या नदीची आहे तीच मानोरा तालुक्यातल्या इतर नैसर्गिक संसाधनांची सुद्धा आहे. वाशिम जिल्ह्यातील काही चांगली जंगले, काही चांगले गवताळ माळराण मानोरा तालुक्यातच होते. भरपूर प्रमाणात तेंदू पत्ता, डिंक, औषधी वनस्पती, चारोळी, जनावरांसाठी चारा, जळतण ह्या जंगलातून स्थानीक लोकांना मिळायचा. जंगले चांगली असल्याने शेतीची परिस्थिती सुद्धा उत्तम होती. पेरणीच्या वेळी आणि पिक कापणी दरम्यान बंजारा स्त्रिया त्यांची पारंपरिक गाणी गात जेव्हा बैलगाडीतुन जायच्या तेव्हा साक्षात निसर्ग मंत्रमुग्ध व्हायचा. दुर्दैवाने. आज वाशिम जिल्ह्यात शेतक-यांच्या आत्महत्येत ह्या तालुक्याचा पहिला क्रमांक आहे.

ह्या बदलांच्या मागच्या कारणांचा काळजीपूर्वक विचार करण्याची गरज आहे. त्यासोबतच उपायांच्या बाबतीत सुद्धा पुढाकार घेण्याची नितांत आवश्यकता आहे. बिघडलेला निसर्ग पून्हा जागृत करता येतो असा विश्वास ठेऊन हे काम करता येईल. मानोरा तालुका मानव संसाधनांच्या बाबतीत अतीषय सधन असा तालुका आहे. मजूरांची फार मोठी संख्या ह्या तालुक्यात आहे. दुर्दैवाने असे मजूर रोजगाच्या शोधात मोठ्या प्रमाणावर मुंबई-पुण्याकडे धाव घेत आहेत. वाशिम जिल्ह्यातुन बाहेरगावी स्तलांतरीत होणा-या मजुरांची संख्या मानोरा तालुक्यातुनच जास्त आहे. अशा हजारो मजूरांच्या मदतीने आणि रोजगार हमी योजनेसारख्या योजना राबवून मानोरा तालुक्याची नैसर्गिक संसाधने पुन्हा जिवंत करता येतील. पुन्हा अरुनावती हसु शकते, गरज आहे जागृतीची आणि कृतीची.

(लेखक पर्यावरण अभ्यासक असुन लंडन स्थित रुफोर्ड मॉरिस फाउंडेशन चे नदी अभ्यासाच्या बाबतीतले फेलो आहेत)

मधमाशा संपने म्हणजे शेती संपने

मधमाशा संपने म्हणजे शेती संपने

डा. निलेश हेडा

मधमाशी तसा छोटासाच जीव पण सहजीवनाचं उत्तम उदाहरण आपल्याला पटऊन देतो. अविरत कार्यमग्न असणे, समुहाचं हित जोपासुन त्यानुसार कृती करत जाणे, विविध कामांची विभागणी (Division of labor) करुन मधाच्या पोळ्याचं उत्कृष्ठ व्यवस्थापन करणे, प्रसंगी पोळ्याच्या हितासाठी स्वत:चा जीव धोक्यात टाकणे हे काही गुण प्रत्येकाने शिकुन घ्यावेत असेच आहेत. दुर्दैवाने ह्या जीवाचे अस्तीत्वच धोक्यात आले आहे.

उत्क्रांती शास्त्रात (Evolution) को-इव्होलुशन म्हणून एक संकल्पना आहे. को इव्होलुशन म्हणजे एका प्रजातीची उत्कांती होत असतांना त्याच्या सोबत सोबत अन्य प्रजातीची सुद्धा होत जाणे. याचं उत्तम उदाहरण आपल्याला सपुष्प वनस्पती आणि किटकांच्या उक्रांतीच्या बाबतीत आपल्याला बघायला मिळते. सपूष्प वनस्पतीत दिसणारी फुलांच्या रंगाची, आकाराची, गंधाची विविधता निर्माण होण्याचं कारण म्हणजे वनस्पतींना किटकांना आकर्षीत करायचे होते. जास्त सुंदर रंग म्हणजे जास्त किटक आणि जास्त किटक म्हणजे जास्त परागीकरण. सहजीवनाचं सुंदर उदाहरण किटक आणि सपुष्प वनस्पतीच्या संदर्भात आपल्याला बघायला मिळते. वनस्पती त्यांच्यातला गोड मध किटकांना देतो तर त्याबदल्यात किटक परागीकरणाची सेवा वनस्पतींना उपलब्ध करुन देतात.

सहभागी सहजीवनाचं एक उत्तम उदाहरण मधमाशांच्या स्वरुपात आपल्याला बघायला मिळते. आपल्या मधाच्या पोळ्यासाठी प्रत्येक सभासद सतत झटत असतो. प्रत्येक सभासदाची एक विषिष्ट अशी जबाबदारी निसर्गाने प्रदाण केलेली असते. प्रसंगी प्राणाची बाजी लाऊन अशा जबाबदारीचं पालन केल्या जाते. उदाहरणादाखल मधाच्या पोळ्याचं संरक्षण करण्याची जबाबदारी असणा-या मधमाशा (Fighter bee) जेव्हां शत्रूला डंख मारतात तेव्हा त्यांचा सुद्धा जीव जातो! अशाचं अनेक प्रकारच्या मधमाशात कामकरी माशा (Worker bee) सुद्धा असतात. अशा मधमाशा अनेक किलोमीटर अंतरावरुन परागकण गोळा करुन आणतात आणि त्यापासुन पोळ्यात मध तयार करतात.

जेव्हां मधमाशा शेतात किटकनाशकांनी फवारणी केलेल्या फुलातुन परागकण गोळा करुन आणतात तेव्हा परागकणासोबतच सुक्ष्म प्रमाणात विषाचे अंश सुद्धा त्यांच्या शरीरात जातात आणि आपल्या मधाच्या पोळ्याजवळ येण्याआधीच त्यांचा मृत्यू होतो. परिणामत: आपल्यासाठीच्या अन्नाची वाट बघणारी मधमाशांची छोटी बालके, राणी माशींची उपासमार होते. अशा रासायणीक किटकनाशकात कार्बोफुरान (Carbofuran), मेथोमिल (Methomyl), मेथीयोकार्ब (Methiocarb), मेक्झाकार्बेट (mexacarbate), प्रोपोक्झर (Propoxur), अझिनफास मिथील (Azinphos-methyl), क्लोरपायरीफास (Chlorpyrifos), डेमेटान (Demeton), डायाझीनान (Diazinon), डायक्रोटोफास (dicrotophos),मॅलाथीआन (Malathion), मोनोक्रोटोफास (Monocrotophos), एंडोसल्फान (Endosulfan), अल्ड्रीन (Aldrin), डाएल्ड्रीन (dieldrin) सोबतच शेकडो प्रकारच्या किटकनाशकांचा समावेश होतो.

इतक्यात मधमाशांच्या पोळ्यांमध्ये विविध प्रकारचे आजार बळावत चालले आहेत. हे आजार विविध प्रकारच्या कारणांनी, ज्यात रासायणीक किटकनाशकांचा महत्त्वाचा समावेश आहे, होत असल्याचे अभ्यासक सांगतात. युरोपीयन देशांमध्ये मधमाशात ’कालनी कोलॅप्स डिसआर्डर’ नावाचा एक गंभीर आजार बळावतो आहे. ह्या आजारात मधमाशांच्या पोळ्यातल्या कामकरी माश्या अचानक संपून जातात. भारतातही ह्या रोगाची लागन झाल्याचे लक्षात येत आहे. प्रत्येकाने एक निरिक्षण केले असेल की आपल्याकडे एकेकाळी मोठ्यासंखेने आढळणारी आग्यामाशांची (Apis dorsata) पोळी झपाट्याने कमी होते आहे. मोठ्या इमारती, मोठी झाडे एकेकाळी मधमाशांच्या पोळ्यांनी लगडलेली असायची पण आता ती ओकीबोकी होत आहे. आपल्या आदिवासींना हक्काचा रोजगार दरवर्षी मधमाशांच्या मधाच्या, मेणाच्या, स्वरुपात मिळायचा आता तो दरवर्षी घटतो आहे. मधमाशा निसर्गातुन कमी होणे म्हणजे एका मोठ्या अन्न धान्य संकटाला निमंत्रण देणे आहे कारण फलधारणाला मदत करणा-यांमध्ये मधमाशा एक महत्त्वाची भूमिका बजावतात (म्हणजे कदाचीत अशीही वेळ येऊ शकते की झाडांना भरपुर पाने फुले लागतील पण फलधारणा होणार नाही!).

त्यामुळे किटकनाशकांच्या अवाजवी उपयोगाबद्दल गंभीरतेने विचार करण्याची गरज निर्माण झाली आहे. किटकनाशकांच्या उपयोगाने यापुर्वीच मोठ्या प्रमाणावर आपण नद्या दुषीत करुन माश्यांच्या अनेक प्रजाती संपवल्या आहेत. पक्षांच्या अनेक जाती सुद्धा आपण धोक्यात आनल्या आहेत. तननाशकाच्या उपयोगाने एकावेळी चाळिस-चाळिस मोर मृत्यूमुखी पडल्याच्या घटना विदर्भात अनेक ठिकाणी घडल्या आहेत. मानसाच्या शरीरात मोठ्या प्रमाणावर गेलेल्या विषाचे दुष्परिणाम आज शरीरावर जानवायला लागले आहेत. त्यामुळे सरकारी स्तरावर किटकनाशकाच्या अवाजवी वापराबद्दल नीती निर्धारण करुन कडक नियम तयार करण्याची गरज आहे पण त्याच वेळी प्रत्येक शेतक-याने दुरचा विचार करुन शेतीच्या आणि मधमाशाच्या सहसंबंधाला जाणुन घेऊन किड नियंत्रणाचे विकल्प शोधने गरजेचे झाले आहे.

(लेखक पर्यावरण अभ्यासक असुन रुफोर्ड फाउंडेशन, लंडनचे फेलो आहेत)

मांसाहारी जीव जंगलाचे व शेतीचे रक्षण करतात

मांसाहारी जीव जंगलाचे व शेतीचे रक्षण करतात !

डॉ. नीलेश हेडा,

संवर्धन,

कारंजा (लाड)

( ९७६५२७०६६६

अमरावती जिल्ह्यातल्या पिंपळखुटा नावाच्या गावातला एक युवा शेतकरी सकाळी शेतात जातो आणि शेतीची रानडुकरांनी केलेली नासधुस बघून त्याला धक्का बसतो आणि घरी येऊन विष प्राशन करुन आत्महत्या करतो. कारंजा लाड जवळ खेर्डा नावाचे गाव. खेर्डा येथील एका मजूराला धडक मारुन निलगाईने जागीच ठार केले. ह्या आणि अशा घटना दिवसेंदीवस वाढत चालल्या आहेत. वन्य जीव आणि माणूस ह्याच्यातल्या परस्पर संघर्षाची तिव्रता वाढत चालल्याची दिसते. ह्या घटनांचा परिसर विज्ञानाच्या अंगाने मुलभूत विचार करण्याची गरज आहे. राणडूकरांची, हरणांची, निलगाईंची संख्या का वाढली याचा निसर्ग नियमांनी विचार करुन मूलभूत उपाय करण्याची गरज आहे.

१९६९ मध्ये राबर्ट पायने (Robert Paine) नावाच्या शास्त्रज्ञाने परिसर विज्ञानातली ‘स्टोन स्पेसिज’ (Keystone Species) नावाची नावाजलेली संकल्पना दिली होती. आष्ट्रॅलिया मधील ग्रेट बॅरीयर रिफ मध्ये केलेल्या संशोधनाच्या आधारावर त्याने हे काम केले. ग्रेट बॅरीयर रिफ हा खुप चांगली जैवविविधता असलेला समूद्राच्या खारफूटी जंगलाचा भाग. ह्या परिसरात तारा मासा (Pacific north west startfish) आणि मोठ्या आकाराची गोगलगाय (Large snail) हे दोन महत्त्वाचे मांसाहारी जीव. पायनेच्यानुसार जर ह्या दोन्ही जीवांना त्यांच्या अधिवासातुन काढून टाकलं तर हे दोन जीव ज्या भक्षांवर अवलंबून असतात त्यांच्या भक्षांच प्रमाण सुरुवातीला अनेक पटींनी वाढते आणि पर्यायाने संपूर्ण परिसंस्थेचा नाश होतो. म्हणजेच काय तर ह्या संकल्पनेनुसार परिसंस्थेत काही जीवांवर संपूर्ण परिसंस्थेचे आरोग्य अवलंबून असते. जर अशा जीवांची संख्या घटली तर पर्यायाने संपूर्ण परिसंस्थेचाच तोल जातो. अशा जिवांना कीस्टोन स्पेसीज म्हणतात. कोने एकेकाळी विदर्भात भरपूर प्रमाणात आढळणारे चित्ते, वाघ, बिबटे, लांडगे, कोल्हे हे सर्व मांसाहारी जीव आपल्या साठी कीस्टोन स्पेसीज होते. एका अर्थाने शाकाहारी जीवांच्या प्रमाणावर नियंत्रण ठेऊन ते जंगलाचे आणि शेतीचे रक्षणच करायचे.

असे मांसाहारी जीव जरी संखेने कमी असले तरी त्यांच्यावर निसर्गाने अनेक जबाबदा-या दिल्या होत्या. ते जंगलांचे, वनस्पतींचे खरे रक्षक होते. कारण वनस्पतींना नष्ट करणा-या शाकाहारी प्राण्यांच्या संखेवर ते नियंत्रण ठेवायचे. त्यांच्या मुळे शेती सुरक्षीत होती. पण अशा मांसाहारी प्राण्यांचे अधिवास आपण नष्ट केल्याने त्यांची संख्या कमालीची घटली. चित्ते व वाघ तर आपल्या विभागातून संपूर्णपणे नामशेष झाले. ह्या जीवांचे विषिष्ट असे अधिवास असतात. त्यांच्या अधिवासात जर बदल झाले तर आपोआपच त्यांच्या संखेवर प्रतिकुल असा परिणाम होतो. हे मांसभक्षी जीव कमालीचे कमी झाल्याने आपल्या विभागातील रान डुक्कर, निल गाय, हरीण कमालीचे वाढले ज्याचा परिणाम आपोआपच शेती वर व्हायला लागला. एकी कडे शाकाहारी जीवांना पोसणारी जंगले कमी होत चालली आणि दुसरी कडे शेती फोफावत चालली परिणामत: आपली भूक भागवण्यासाठी ह्या शाकाहारी जीवांनी आपला मोर्चा शेतीकडे वळवला यात नवल नसावे. आज आपल्या कडे शेतीच्या नाशासाठी जंगली जनावरांचा त्रास हा महत्त्वाचा त्रास असल्याचे लोक सांगतात. त्याच वेळी ह्या शाकाहारी जिवांचा लोकांना शारीरीक त्रास सुद्धा भरपूर व्हायला लागला. रान डुकरांनी किंवा निलगायने जखमी केलेल्या, जीवे मारल्याच्या अनेक घटना निरंतर वर्तमान पत्रातुन येत असतात. या घटणांचा एकच अर्थ आहे की मानसाने वन्य जीवांच्या अधिवासात अतीक्रमन केले. माणूस असो की वन्य प्राणी आपल्या घरात झालेले अतीक्रमण सहन करत नाही व आक्रमक होतो हे साधेसे तत्व ह्या मागे आहे.

अशा परिस्थितीत रान डुकरांच्या किंवा हरणांच्या शिकारीला नियंत्रीत परवाणगी देणे हे एक समाधान असु शकते पण संपूर्ण उपाय निश्चितच नाही. संपूर्ण उपायात मांसभक्षी जीवांचे अधिवास पुन्हा पुनरुज्जीवीत करण्याशीवाय दुसरा मार्ग नाही. असे अधिवास ज्यात प्रामुख्याने जंगलांचा समावेश होतो पुन्हा पुनरुज्जीवीत करण्याची तातडीने गरज आहे. हे काम लोक सहभागाने होऊ शकते. जर हे करण्यात आपण कमी पडलो तर शेतीचा व उरलेल्या जंगलांचा असाच नाश होत राहिल. त्यामुळे शेतीच्या दृष्टीने विचार केल्यास आसपास जंगलाचे प्रमाण व्यवस्थित प्रमाणात असणे हे केवळ शाकाहारी जिवांच्या दृष्टीनेच चांगले नाही तर इतर अनेक बाबतीत हे महत्त्वाचे आहे.

(लेखक निसर्ग अभ्यासक आणि रुफोर्ड मॉरिस फाउंडेशन, लंडन चे नदी अभ्यासाच्या बाबतीतले फेलो आहेत.)

माणवी सभ्यता नष्ट का होतात?

डॉ. नीलेश हेडा

संवर्धन

कारंजा (लाड)

( ९७६५२७०६६६

माणवी सभ्यतांच्या इतिहासाचा काळजीपूर्वक अभ्यास केला तर जाणवते की प्रामुख्याने नैसर्गिक संसाधनात झालेल्या नाशामुळे अनेक माणवी सभ्यता लयास गेल्या आहेत. माणवी इतीहास हा नैसर्गिक संसाधनांच्या मानवा करवी केलेल्या –हासाचा पण त्याच वेळी काही माणवी गटांद्वारे निसर्गाच्या केलेल्या संवर्धनाचा आणि संसाधने लयाला गेल्याने उद्भवलेल्या माणवी गटांगटांमधील संघर्षाचा इतिहास आहे. माणवी इतिहासात एका विशिष्ट अशा प्रभावशाली गटाने नेहमीच निसर्गाचे शोषन केल्याचे दिसून येते.

सुमारे १० हजार वर्षांपुर्वी माणूस हा शिकार करुन आणि कंदमूळे गोळा करुन आपला उदरनिर्वाह करायचा. सुमारे १० हजार वर्षांआधी प्रथमत: पृथ्वीवरील शितयुगाचा अंत होऊन हिम खंड वितळायला लागले आणि माणसाने शेती करायला आणि पशुपालन करायला सुरुवात केली. माणसाचे भटकंतीच्या जीवन शैलीपासुन शेतक-याच्या भूमिकेत जाण्याने अनेक बदल निसर्गात व्हायला लागले. शेतीची सुरुवात झाल्याने गावे वसायला लागली. अन्नाची शाश्वती वाढल्याने व्यापार वृद्धींगत व्हायला लागला. शहरे वसल्याने कारखानदारीचा उत्कर्ष व्हायला लागला. माणवी सभ्यता हळुहळू उत्र्कांत आणि विकसीत व्हायला लागली.

साधारणत: समकालीन असलेल्या मिसोपोटॅमीया (Mesopotamia) (५३०० ख्रि.पूर्व), इजिप्त (३१५० ख्रि.पूर्व), भारतात सिंधू (ख्रि.पूर्व ३३००-१४००) आणि चिन मध्ये अतिषय उत्कर्षाला पोहोचलेल्या माणवी संस्कृतींचा जन्म झाला. ह्या सर्व पुरातन संस्कृतींमधले सारखेपण म्हणजे ह्या नद्यांच्या सुपीक अशा खो-यांमद्ये उदयास आल्या आणि खास करुन शेतीच्या प्रगतीमूळे आणि अनुकूल पर्यावरणामुळे उत्कर्षाला पोहोचल्या. सद्याच्या इराक, सायरीयाचा काही भाग, दक्षीण तुर्कचा काही भाग आणि इरानच्या काही भागात पसरलेल्या टिग्रिस (Tigris) आणि युफ्रॅटेस (Euphrates) नद्यांच्या खो-यात मिसोपोटॅमीया संस्कृतीचा उदय झाला. नाइल नदीच्या खो-यात इजिप्तच्या संस्कृतीचा उदय झाला, भारतात सिंधू नदीच्या खो-यात सिंधू संस्कृतीचा उदय झाला (सिंधूच्या काठचे लोक हिंदू!) त्याच वेळी चिन मध्ये सुद्धा यलो नदी आणि यांगत्से ( Yellow River and theYangtze River valleys) नदीच्या खो-यात माणवी संस्कृतींचा उदय झाला. ह्या सर्व सभ्यता शेतीच्या ज्ज्ञानाच्या बाबतीत अतीषय पुढारलेल्या होत्या. त्यांच्यात धातू शास्त्र, कुंभार काम, लाकुड काम, जनावरांना पाळीव बनवण्याचे ज्ज्ञान, वैद्यकशास्त्र, जोतीष्य, ग्रहता-यांचे ज्ज्ञान विपूल प्रमाणात होते. कलेच्या बाबतीतही ह्या सभ्यता आपल्या उत्कर्षाला पोहोचल्या. मात्र यात एक साम्य होते आणि ते म्हणजे पर्यावरणात झालेल्या बदलामुळे (ज्यात माणवी कारणांचा महत्त्वाचा सहभाग होता) ह्या सभ्यता आपल्या अस्ताला गेल्या.

ह्या सर्व सभ्यता नद्यांच्या सुपीक अशा खो-यात जन्माला आल्या. भरपूर गाळाच्या जमीनीमूळे शेतीचा उत्कर्ष झाला. अन्न धान्याची चिंता मिटल्यामुळे लोक संख्या भरपूर वाढायला लागली. लोकसंख्या वाढल्याने नैसर्गिक संसाधनांवरचा तान वाढायला लागला. जंगले घटत गेली. प्राण्यांचे अधिवास नष्ट व्हायला लागले. जंगले तोडली गेल्याने मातीची धुप व्हायला लागली. सुपीक माती वाहुन जाणे, जमीनीवरचा तान वाढणे इत्यादी कारणांनी शेतीची सुपीकता कमी व्हायला लागली. जंगले नष्ट झाल्याने मलेरियाचे प्रसारक असलेल्या डासांनी आपला जंगलातील अधिवासांना हलवून माणवी वस्त्यात आपले बस्तान बसवले आणि माणवी वस्त्यात हिवताप झपाट्याने पसरला. असे म्हणतात की सिकंदरच्या सैन्याचा पराभव होण्याचे एक महत्त्वाचे कारण हे भारतातील हिवताप पसरवणारे डास होते कारण त्याच्या सैनिकांना मोठ्या प्रमाणावर हिवतापाची लागन झाली होती. जुण्या काळात (३८० ख्रिस्तपूर्व) नैसर्गिक संसाधनांचा –हास झाल्याचे वर्णन प्लेटोने आपला देश अट्टीकाच्या संदर्भात केले आहे. तो म्हणतो, “आता फक्त मूळ देशाचे अवशेष मात्र शिल्लक आहेत….. जे शिल्लक आहे ते आहे केवळ विविध प्रकारच्या आजारांनी जर्जर झालेले शरीर ……संपूर्ण सुपीक माती वाहुन गेली आहे आता ह्या देशाची फक्त हाडे आणि कातडी वाचली आहे”.

प्राचीन रोम हे निसर्ग संवर्धनाचे आणि त्याच वेळी त्याच्या नाशाचे विरोधाभासी उदाहरण आहे त्यांनी कालवे खोदून आणि तुषार सींचनासारख्या मार्गांनी जल संवर्धनाचे उत्तम काम केले पण त्याच वेळी जंगलातील संसाधनांच्या व्यवस्थापनात कमी पडले आणि ऐतिहासीक संशोधन सांगते की खास करुन जंगलाच्या –हासामुळे रोमन साम्राज्य कोलमडले. कारण जल संसाधन असो की शेती संसाधन त्याचा जंगलाशी घणीष्ट असा संबंध असतो. जंगलांचा –हास झाला की आपोआपच जंगली जनावरांचा शेतीला त्रास वाढतो, जंगले ही जल संवर्धनातही मोलाची भूमिका बजावतात, जंगलाच्या कमतरतेमुळे मातीची मोठ्या प्रमाणावर धुप होते आणि नद्या गाळाने भरुन नद्यांचा नाश होतो. प्राचीण रोम मध्ये असचं घडलं असावं.

भारताच्या सिंधू नदीच्या काठी (आता बराचसा भाग पाकिस्तान मध्ये) सिंधू संस्कृतीचा उदय झाला. ह्या संस्कृतीला नांगराचा उपयोग माहित होता. व्यापारात हे लोक पारंगत असल्याने ह्या लोकात साक्षरतेचे प्रमाणही असल्याचे पुरावे आहेत. खास करुन खंडाच्या सरकण्याने, हिमालयाच्या वाढीमुळे आणि सिंधू नदी मध्ये झालेल्या मानव निर्मित बदलामुळे सिंधू आणि इतर नद्यांनी आपले मार्ग बदलवले आणि नदीत प्रचंड गाळ साचल्याने सिंधू नदीचे पात्र कीतीतरी फुटाने वर उचलल्या गेले (वर्तमान काळात गेल्या दोन वर्षांआधी बिहार मध्ये कोसीने असाच आपला मार्ग बदलवला आहे). उपग्रह चित्रांनी हे स्पष्ट झाले आहे की, सतलज नदी सिंधू नदीला मिळण्यासाठी पश्चिमेकडे सरकली आणि यमुना पुर्वेकडे सरकून गंगेला मिळाली परिणामत: सरस्वती लुप्त झाली. यात एक महत्त्वाचा बदल हा सुद्धा झाला की पुराचे प्रमाण मोठ्या प्रमाणावर वाढले. परिणामत: अतीषय उन्नत अशी सिंधू संस्कृती लयाला गेली. साधारणत: अशीच परिस्थिती मिसोपोटॅमीया आणि चिनच्या संस्कृती बद्दल घडली.

संस्कृतीच्या बाबतीत आपण आज उत्कर्षावर आहोत. माणवी तंत्रज्ज्ञान, कला, शेती, व्यवस्थापन आपल्या चरम सिमेवर पोहोचले आहे. मात्र त्याच वेळी नैसर्गिक संसाधनांच्या शोषनाच्या बाबतीत, अती उपयोगाच्या बाबतीत आणि त्याच्या चुकीच्या नियोजनाच्या बाबतीत आपण आघाडीवर आहोत. भरपूर प्रमाणात जंगल तोडले जाणे, मातीची धुप होणे, नद्यांचा प्रदुषनाने आणि अती शोषनाने मृत्यू होणे, नद्यांचे नैसर्गिक मार्ग बदलून पुरांचे धोके वाढणे, शेतीची सुपीकता कमी होणे, पर्यावरणात मोठ्या प्रमाणावर विष पेरल्या जाणे, अनेक प्रजाती संपून जाणे, परदेशी प्रजातींच्या द्वारे स्थानीक प्रजातींचे अस्तीत्व धोक्यात येणे, पृथ्वीचे तपमान वाढून धृवांवरचा बर्फ वितळणे, मांन्सुनचे चक्र बदलने अशा विविध कारणांनी सद्याची अत्यंत उत्कर्षाला पोहोचलेली माणवी सभ्यता नष्ट होण्याचा मोठा धोका निर्माण झाला आहे. अशा परिस्थितीत इतिहासापासुन प्रेरणा घेऊन नियोजन करणे गरजेचे आहे कारण इतिहास हा वारंवार स्वत:ची पुनरावर्ती करतो, तो पुनरावर्ती यासाठी करतो कारण आपण इतिहासापासुन शिकत नाही. मिसोपोटेमीया, इजिप्त, सिंधू आणि चिनच्या संस्कृतीच्या –हासाच्या पुनरावर्ती टाळल्या जाऊ शकते.

(लेखक पर्यावरण अभ्यासक असुन रुफोर्ड मॉरिस फाउंडेशन चे नदी अभ्यासाच्या बाबतीतले फेलो आहेत)